**************राज़ ******************

कुछ अनजाना अनसुना राज ए उल्फत था छुपाने को 
हम वो कर गये बयान जो ना था  सुनाने को 
हमने कीये  ये लाख जतन तुम्हे भुलाने को 
पर याद का क्या वो तो आ ही गयी हमे रुलाने को

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*****हिसाब ****